Tuesday, August 26, 2025

बारिश की बूँदों में बचपन"


✍️ लेखक: L. Suresh Kumar


गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही थीं और सावन की पहली बारिश ने जैसे पूरे गाँव में जान फूंक दी थी। सुबह-सुबह आसमान में काले बादल छाए और देखते ही देखते बूंदें टपकने लगीं। पहले मिट्टी ने सोंधी खुशबू छोड़ी, फिर बूँदों ने तालियाँ बजाईं, और फिर हम बच्चों ने – जैसे बस इंतजार ही कर रहे थे – झट से कपड़े उतारे और नंगे पाँव गलियों में दौड़ पड़े।

गली के मोड़ पर जो बड़ा नाला था, वहीं जमा होता था हमारा "बारिश क्लब"। कुछ बच्चे अपनी छोटी-छोटी छतरियाँ लेकर, कुछ प्लास्टिक की थैली को सिर पर बांधे, और कुछ वैसे ही मुँह खुला छोड़कर बारिश का स्वाद लेते हुए।

“देखो, किसका कागज़ की नाव दूर तक जाएगी!” — राहुल चिल्लाया।

हमने किताबों के पुराने पन्ने फाड़े और छोटी-छोटी नावें बनाईं। वो नावें बहतीं, घूमतीं, कहीं अटकतीं, फिर किसी तेज बूँद से धकेली जातीं।

पानी से लबालब भरे खेत की मेड़ें हमारे लिए खेल का मैदान बन गईं। कहीं हम कीचड़ में फिसलते, कहीं आपस में छींटे मारते। एक बार तो रमेश फिसलकर सीधे कीचड़ में जा गिरा — और पूरा का पूरा मिट्टी का भूत बन गया। हम सब हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए।

बारिश की तेज़ धार में हाथ फैलाकर नहाने का वो मज़ा — जैसे खुद आसमान माँ बनकर हमें स्नान करा रहा हो। ठंडी बूँदें, भीगे बाल, और लिपटी मिट्टी — ये सब कुछ मिलकर ऐसा जादू बुनते, जो आज भी दिल में ताज़ा है।

शाम को माँ ने जैसे ही भीगा देख लिया — "बीमार पड़ जाओगे!" कहकर तौलिया पकड़ाया, लेकिन उसकी मुस्कान बता रही थी कि उसे भी हमारे बचपन की ये बारिश भली लग रही थी।

"बारिश में भीगना एक खेल नहीं था, वो बचपन की एक रस्म थी। मिट्टी से सने वो दिन, और बूँदों से भरे वो चेहरे आज भी हर सावन में मन के किसी कोने में भीग जाते हैं।"

💦 क्या आपने भी भीगती बारिश में कागज़ की नाव चलाई है या कीचड़ में गिरकर दोस्तों के साथ हँसे हैं?
🌧️ आइए, "Meri Zindgi" ब्लॉग पर लौटिए — वहाँ मिलती हैं वो पुरानी बूँदें, वो हँसी, और वो खेल!

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